' झुकी पीठ पर बोझ' में मेरे दोहे : देवेन्द्र माँझी
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देवेन्द्र माँझी
अपनी बात को कम-से कम शब्दों में कहने के सलीक़े ने मुझे शुरू से ही प्रभावित किया है। इसी के चलते मैं ग़ज़लों की ओर प्रेरित हुआ, क्योंकि उसमें नपे-तुले शब्दों में अपनी बात को काव्यात्मक अंदाज़ में कहने का जो सलीक़ा है, वह और कहीं देखने को नहीं मिलता। हाँ, हिन्दी के दोहा-छंद में यह ख़ूबी अपने भरपूर अंदाज़ में पाई जाती है, इसलिए यह विधा भी मुझे बराबर लुभाती रही है और मैं ग़ज़लों के साथ-साथ दोहे भी लिखता रहा हूँ। मेरे दोहों का पहला संग्रह ' झुकी पीठ पर बोझ' शीर्षक से वर्ष-2008 में 'मंजुली प्रकाशन, पी--4, पिलंजी, सरोजनी नगर, नई दिल्ली--110023 से प्रकाशित हुआ। इसकी भूमिका सुप्रसिद्ध गीतकार डा. कुँवर बेचैन ने लिखी। उन्होंने इस संकलन के बारे में जो लिखा, वह जस का तस नीचे लिखा है--
देवेन्द्र माँझी के दोहे: समाज का दर्पण
प्राचीनकाल से अब तक यदि कोई छंद अपनी सत्ता को क़ायम रख सका है तो हिन्दी कविता के क्षेत्र में यह छंद 'दोहा' है। चाहे नाथ सम्प्रदाय के कवि रहे हों, चाहे प्राकृत-अपभ्रंश के कवि रहे हों--सभी ने दोहा-छंद में ही रचना की। भक्तिकाल में कबीर की 'साखियाँ' दोहा-छंद हैं, जिनमें सामजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक क्षेत्रों में बाह्याडम्बरों पर बड़ी ही कुशलता से प्रहार किया गया है। जीव-ब्रह्म के सम्बन्ध को दर्शानेवाले अनेक दार्शनिक और आध्यात्मिक दोहे कबीर ने लिखे। तुलसीदास ने 'दोहावली' में पूरा काव्य ही लिख दिया। रामचरित मानस में भी दोहा-चौपाई पद्धति का प्रयोग है और 'दोहे' में बड़ी गहन बातें कही गई हैं। जायसी ने 'पदमावत' में दोहे-चौपाई पद्धति का प्रयोग किया। रहीमदास ने जीवानुभवों को अपने दोहों में बड़ी ही कुशलता से पिरोया। बिहारीलाल ने गागर में सागर भरकर दोहा-छंद को वह गरिमा प्रदान की जिसका प्रकाश आज-तक फैल रहा है। रीतिकालीन अधिकतर कवियों ने दोहा-छंद में अपने भावों की अभिव्यक्ति की। हाँ, आधुनिक काल के एक विस्तृत काल-खण्ड में दोहा लगभग विलीन हो गया था। वह लोकशैली के नाटकों, स्वांग, भगत आदि में देखने को ही मिल रहे थे। किन्तु इन दिनों दोहा-छंद पुन: स्थापित हो रहा है। इधर सभी हिन्दी-कवियों ने दोहे लिखे हैं। अनेक समवेत संकलन प्रकाशित हो चुके हैं और इसी परम्परा में अनेक स्वतन्त्र-संकलन भी। पत्र-पत्रिकाओं में भी दोहों ने विशिष्ट स्थान प्राप्त कर लिया है। इसका प्रधान कारण यह है कि दोहे में केवल दो पंक्तियाँ होती हैं और अंतिम तुकान्तों के मिलने के कारण उसमें गेयता और सम्प्रेषणीयता का गुण भी शामिल हो जाता है। 'दोहा' मात्रिक छंद है, जिसमें चार चरण होते हैं। पहले और तीसरे चरण में सामान्यत: तेरह-तेरह तथा दूसरे और चौथे चरण में ग्यारह-ग्यारह मात्राएँ होती हैं। दोनों पंक्तिओं के अंत में गुरु-लघु होना अनिवार्य होता है। ऐसा यह दोहा-छंद इन दिनों केवल भारत में ही नहीं, वरन् पाकिस्तान के शायरों में भी बहुत लोकप्रिय है। केवल हिन्दी भाषा में ही नहीं, उर्दू के शायर उर्दू में भी दोहे कह रहे हैं। जैसे हिन्दी-भाषा में ग़ज़ल ने अपना स्थान बना लिया है, ठीक वैसे ही उर्दू में दोहा भी अपना स्थान बना रहा है।
अलग-अलग भाषाओं की विशिष्ट छंद-विधाएँ एक-दूसरे के क्षेत्र में पदार्पण करती हैं तो एक सांस्कृतिक मिलन का सेतु भी तैयार करने लगती हैं। हिन्दी कविओं द्वारा ग़ज़ल कहने और उर्दू में दोहों के लिखे जाने के कारण साम्प्रदायिक-एकता और सांस्कृतिक-समन्वय को ही बल मिलता है।
इधर, हिन्दी में जितने दोहाकार हुए हैं, उनमें देवेन्द्र माँझी के दोहे भी पाठक और श्रोताओं का ध्यान अपनी ओर खींच रहे हैं। देवेन्द्र माँझी लब्ध-प्रतिष्ठित ग़ज़लकार हैं और ग़ज़ल में जो शे'र होते हैं, वे भी दो पंक्तिओं में ही होते हैं, वहाँ भी एक गहरे जीवनानुभव को दो पंक्तिओं में समेट लेने का कौशल होता है। अत: देवेन्द्र माँझी अपने अनुभवों को आदतन दो पंक्तिओं में कहने लगे हैं। हुआ कि दोहा भी उन्हें सिद्ध हो गया। हाँ, एक बात जो इधर के दोहों में मिलती है और देवेन्द्र माँझी के दोहों में भी मिलेगी, वह यह है कि इधर के दोहे पुराने दोहों की तरह धार्मिकता के रंग या घोर श्रृंगारिकता के रंग में रँगे नहीं हैं, वरन् उनमें आज की विसंगतिओं के चित्र अधिक हैं। वे सामाजिक यथार्थ से अधिक जुड़े हैं। इस दृष्टि से आज के दोहे कबीर के दोहों के निकट अधिक हैं, क्योंकि उनमें भी सामाजिक विद्रूपता और बाह्याडम्बरों पर तेज़ प्रहार किए गए हैं। ज़ाहिर है देवेन्द्र माँझी के दोहों का भी यही रंग है, यही 'शेड' है।
देवेन्द्र माँझी के दोहे काव्य की दृष्टि से जिन चीज़ों से जुड़े हैं वे हैं --ग़रीबी, रिश्ते-नाते, झूठ, छल-कपट, शोषण, पुलिस, वेश्यावृति, स्वछन्दता, राजनितिक-विद्रूपता एवं अन्य जीवानुभव।
मनुष्य के जीवन में ग़रीबी सबसे बड़ा अभिशाप है, हम सब जानते हैं। ग़रीबी मजबूर भी कर देती है। न तो शक्ति है और न आयु, फिर भी पेट भरने के लिए ग़रीब आदमी मज़दूरी कर रहा है--
मजबूरी ने कर दिया, उसको कितना ढीठ।
बोझा फिर भी ढो रहा, झुकी हुई है पीठ।।
क्योंकि वह जानता है कि कल जब उसे काम मिलेगा तब ही उसे खाना नसीब हो पायेगा। मज़दूरी के अभाव में आज रात तो उसे खाली पेट जागना ही है--
सुबह काम मिल जाएगा, तब लेगा वो भात।
रह कर खाली पेट जो, जागा सारी रात।।
--और इधर, उसकी पत्नी और बच्चों का जो हाल है वह भी अवर्णीय है--
भूखी महतारी भला, दूध कहाँ से लाय।
सूखी छाती चूसता, बच्चा बिलखा जाय।।
ग़रीबी व्यक्ति को कहाँ-कहाँ नहीं भटकाती? रोटी के लालच में कैसे-कैसे धोखों में नहीं फँसना पड़ता। ग़रीबी ईमान से डगमगाने को मजबूर कर देती है। चोरी, डकैती, अनैतिकता, देह-व्यापार जैसे वीभत्स कार्यों में उलझा देती है। कवि देवेन्द्र माँझी ने देह-व्यापार में फँसी लड़कियों की व्यथा-कथा को अपने दोहों में अभिव्यक्त किया है--
मौसी बनकर लाई थी, जिसको साथ लिवाय।
कुछ रुपयों के लोभ में, कोठे दई बिठाय।।
* * *
सबकी क़िस्मत एक है, लता-सुमन-शहनाज़।
पग में घुँघरू बाँधकर, नाच रही हैं आज।।
ग़रीब तरह-तरह से शोषण का शिकार हो रहा है। शोषणकर्ताओं की सारी संवेदनाएँ समाप्त हो गई हैं। शोषणकर्ता के लिए तो शोषित व्यक्ति मांस को एक बोटी के समान है और वह स्वयं एक चील की तरह है--
मैं बोटी हूँ मांस की, वह है उड़ती चील।
क्या फिर वो सुन पाएगा, मेरी करुण अपील।।
आज की क़ानून-व्यवस्था और क़ानून के रखवालों की भी अच्छी खिंचाई देवेन्द्र माँझी ने की है। उनकी निगाह में पुलिस भी अपराधों को नहीं रोक पाती है। यही नहीं, अपराधों को जन्म भी देती है। एक प्रकार से पुलिस अपराधों का पर्याय हो गई है--
'माँझी' पानी से बनै, जैसे कीचड़-गाध।
ज्यों-ज्यों बढ़ती है पुलिस, बढ़ते हैं अपराध।।
* * *
हुआ पुलिस का आगमन, माँझी बिस्तर बाँध।
दोनों ही पर्याय हैं, पुलिस और अपराध।।
इसी प्रकार की अन्य सामजिक विद्रूपताओं पर भी कटाक्ष किया है। धार्मिक-उन्माद ने भी मानवता को कितना झकझोरा है। नित्यप्रति का साम्प्रदायिक दंगा-फ़साद इस बात का साक्षी है कि मजहब का नशा मनुष्य को कितना पतित कर देता है। हिंसा, बलात्कार, वहशीपन सब इसी नशे के प्रतिफल हैं--
मानवता सिसकी बहुत, हिंसक थे संवाद।
हमने देखा धर्म का, ऐसा भी उन्माद।।
* * *
लहू गिरा मजलूम का, जले घरौंदे आह।
हवा चली थी आज जो, लेकर इक अफ़वाह।।
आज के समय में रिश्ते-नाते, सेज-सम्बन्धी सभी वैसे नहीं रहे, जैसे कि कभी पहले थे। सभी स्वार्थों के झूलों पर झूल रहे हैं। सभी मान्यताएँ बदल गई हैं। यार-दोस्त, पिता-पुत्र, पति-पत्नी, भाई-भाई, भाई-बहन के रश्ते भी खोखले हो रहे हैं। अपने ही लोग ज़्यादा कष्ट दे रहे हैं--
ग़ैरों से ज़्यादा किया, अपनों ने बे-हाल।
अपना ही नाख़ून था, जिसने छीली खाल।।
* * *
मेरे अपनों ने दिए, मुझको इतने घाव।
जीवन बनकर रह गया, जलता एक अलाव।।
* * *
कब से पैनी कर रहा, हथियारों की धार।
मित्र-मिलन को जाएगा, होकर वो तैयार।।
इस प्रकार कवि देवेन्द्र माँझी ने आज के यथार्थ को अपने दोहों के आईने में उतारा है।चाहे राजनीतिक चालें हों या आरक्षण का मुद्दा अथवा नई पीढ़ी की संवेदनशून्यता--सभी पर कवि ने अपनी क़लम चलाई है।
दोहे अधिकतर जीवनोपयोगी सीख को देने का प्रमुख साधन रहे हैं। रहीमदास के दोहे इसका स्पष्ट प्रमाण हैं। देवेन्द्र माँझी के भी अनेक दोहे इस प्रकार के हैं--
इठलाकर बल खा रहे, लहरों के सब अंग।
सागर की हो जाए ना, आज तपस्या भंग।।
इस प्रकार देवेन्द्र माँझी के दोहे विषय की दृष्टि से बहु-आयामी हैं। इब्तिदा ही इतनी अच्छी है तो अंजाम तो और भी अच्छा होगा ही। देवेन्द्र के इस दोहा-संग्रह के प्रकाशनोत्सव पर मेरी शुभ-कामनाएँ। मुझे विश्वास है कि पाठकों को भी देवेन्द्र के दोहे अच्छे लगेंगे।
गाजियाबाद
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'झुकी पीठ' संग्रह के दोहे------'माँझी के दोहे'
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(1) मात शारदे दीजिए, अब ऐसा वरदान।
कुछ तो अपनी भी बने, इस जग में पहचान।।
* * *
(2) तुलसी, मीरा, सूर सब, समझावें यह बात।
नानक और कबीर की, रही फ़क़ीरी जात।।
* * *
(3) जब दिल पर क़ाबू नहीं, जुड़े न मन की डोर।
राम-राम चीखो नहीं, करो न इतना शोर।।
* * *
(4) व्रत रखो नित नेम से, जाओ चारों धाम।
प्रेम ह्रदय जब ना बसे, तब-तक मिले न राम।।
* * *
(5) कर्म बना है राम अब, कर्म रहा घनशाम।
कर्मों की आराधना, कर ले सुबहो-शाम।।
* * *
(6) दर्शन मुझको दीजिए, अब अपने भरपूर।
जिस पर क़ुर्बां हैं सभी, कैसा है वो नूर।।
* * *
(7) मन में उसको धार लो, बन्द करो अब शोर।
होता है भगवान् भी, आडम्बर से बोर।।
* * *
(8) धर्म-सत्य की ये कथा, बीते युग की बात।
इस युग की देहलीज़ पर, ये हैं काली रात।।
* * *
(9) कलियुग में सब सुन रहे, पैसे की आवाज़।
कान्हा नज़र बचावता, देख सुदामा आज।।
* * *
(10) जाने कैसे खेल में, उलझे हैं सब लोग।
बच्चे भूखे मर रहे, पत्थर को दें भोग।।
* * *
(11) कथनी-करनी में यहाँ, क्यों है इतना भेद।
जिस थाली तू खा रहा, करता उसमें छेद।।
* * *
(12) जो जन औरों के सदा, करता पाप विचार।
गरिमा से वो हीन हो, जाय नरक के द्वार।।
* * *
(13) समय अगर विपरीत है, होगा वो अनुकूल।
अर्पण तुम करते रहो, सद्कर्मों के फूल।।
* * *
(14) नव-पथ के निर्माण का, रखता जो आधार।
उस जन की जग में सदा, होती जय-जयकार।।
* * *
(15) बड़बोली के रंग से, व्यर्थ खेलते फाग।
मरने पर तन को रँगे, जिस्म जलाती आग।।
* * *
दोहे अधिकतर जीवनोपयोगी सीख को देने का प्रमुख साधन रहे हैं। रहीमदास के दोहे इसका स्पष्ट प्रमाण हैं। देवेन्द्र माँझी के भी अनेक दोहे इस प्रकार के हैं--
धारा के विपरीत जब, किया अनूठा काम।
समय-शिला पर तब गया, लिक्खा मेरा नाम।।
* * *
यही सोचकर मैं कभी, करूँ नहीं कुछ आस।
मन दुःख की गगरी बनै, जब टूटे विश्वास।।
* * *
'माँझी' इस संसार में, वो ही मस्त-मलंग।
जिसने जीती है यहाँ, ख़ुद से अपनी जंग।।
* * *
जितनी भी गहराएगी, घोर अँधेरी रात।
उतनी ही उजली यहाँ, होगी नवल प्रभात।।
देवेन्द्र माँझी ने श्रृंगार के भी दोहे लिखे हैं, किन्तु उनमें बहुत-से दोहे सांकेतिक भाषा में ही अभिव्यक्त हुए हैं। तक मर्यादा है, एक संयम है उनमें, जैसे उनका एक दोहा द्रष्टव्य है--इठलाकर बल खा रहे, लहरों के सब अंग।
सागर की हो जाए ना, आज तपस्या भंग।।
इस प्रकार देवेन्द्र माँझी के दोहे विषय की दृष्टि से बहु-आयामी हैं। इब्तिदा ही इतनी अच्छी है तो अंजाम तो और भी अच्छा होगा ही। देवेन्द्र के इस दोहा-संग्रह के प्रकाशनोत्सव पर मेरी शुभ-कामनाएँ। मुझे विश्वास है कि पाठकों को भी देवेन्द्र के दोहे अच्छे लगेंगे।
----कुंवर बेचैन
2 एफ-51, नेहरू नगरगाजियाबाद
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'झुकी पीठ' संग्रह के दोहे------'माँझी के दोहे'
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(1) मात शारदे दीजिए, अब ऐसा वरदान।
कुछ तो अपनी भी बने, इस जग में पहचान।।
* * *
(2) तुलसी, मीरा, सूर सब, समझावें यह बात।
नानक और कबीर की, रही फ़क़ीरी जात।।
* * *
(3) जब दिल पर क़ाबू नहीं, जुड़े न मन की डोर।
राम-राम चीखो नहीं, करो न इतना शोर।।
* * *
(4) व्रत रखो नित नेम से, जाओ चारों धाम।
प्रेम ह्रदय जब ना बसे, तब-तक मिले न राम।।
* * *
(5) कर्म बना है राम अब, कर्म रहा घनशाम।
कर्मों की आराधना, कर ले सुबहो-शाम।।
* * *
(6) दर्शन मुझको दीजिए, अब अपने भरपूर।
जिस पर क़ुर्बां हैं सभी, कैसा है वो नूर।।
* * *
(7) मन में उसको धार लो, बन्द करो अब शोर।
होता है भगवान् भी, आडम्बर से बोर।।
* * *
(8) धर्म-सत्य की ये कथा, बीते युग की बात।
इस युग की देहलीज़ पर, ये हैं काली रात।।
* * *
(9) कलियुग में सब सुन रहे, पैसे की आवाज़।
कान्हा नज़र बचावता, देख सुदामा आज।।
* * *
(10) जाने कैसे खेल में, उलझे हैं सब लोग।
बच्चे भूखे मर रहे, पत्थर को दें भोग।।
* * *
(11) कथनी-करनी में यहाँ, क्यों है इतना भेद।
जिस थाली तू खा रहा, करता उसमें छेद।।
* * *
(12) जो जन औरों के सदा, करता पाप विचार।
गरिमा से वो हीन हो, जाय नरक के द्वार।।
* * *
(13) समय अगर विपरीत है, होगा वो अनुकूल।
अर्पण तुम करते रहो, सद्कर्मों के फूल।।
* * *
(14) नव-पथ के निर्माण का, रखता जो आधार।
उस जन की जग में सदा, होती जय-जयकार।।
* * *
(15) बड़बोली के रंग से, व्यर्थ खेलते फाग।
मरने पर तन को रँगे, जिस्म जलाती आग।।
* * *
(16) कब दम है इस बात में, सब हैं एक सामान।
वैभव ही बस पा रहा, मान और सम्मान।।
* * *
(17) दुःख-तारक इस लोक के, जायँ वैभव धाम।
अब भिलनी के बेर भी, कब खाएँ श्रीराम।।
* * *
(18) गड्ढे में सब गिर रहे, तजें न मन का लोभ।
'माँझी' मुझको सालता, इसी बात का क्षोभ।।
* * *
(19) छोड़ सभ्यता आपनी, नाच रहे सब नग्न।
मीरा और कबीर अब, बैठे चिन्तामग्न।।
* * *
(20) करने को कर लूँ सखे, मैं सच का सम्मान।
कहाँ रही पर राह यह, इतनी भी आसान।।
* * *
(21) 'माँझी' जितना तू रखे, मात-पिता का मान।
देखे है सब ग़ौर से, तेरी भी सन्तान।।
* * *
(22) जबसे टूटे हैं यहाँ, सद्कर्मोंके तार।
मैं ख़ुद बनकर रह गया, इस जीवन पर भार।।
* * *
(23) तू ब्रह्मा, मैं ब्रह्म अंश, 'माँझी' समझूँ सार।
तू भी खेवनहार है, मैं भी खेवनहार।।
* * *
(24) मर्यादा के वास्ते, जीवन करूँ निसार।
खाता हूँ मैं ये शपथ, लेकर हाथ अँगार।।
* * *
(25) सागर तट पर सब खड़े, 'माँझी' लेकर नाव।
कोई जल को देखता, कोई जल के घाव।।
* * *
(26) जो दुनिया की नाव को, करा सके है पार।
'माँझी' उसको ही कहूँ, मैं सच्चा अवतार।।
* * *
(27) अगल-बग़ल सब झाँकते, आती सबको लाज।
शायद सबके सामने, इक दर्पण है आज।।
* * *
(28) कर्म अगर करता रहा, तो है ये विश्वास।
झुक जाएगा एक दिन, क़दमों में आकाश।।
* * *
(29) नैतिकता को थाम कर, चल ले अगर समाज।
सच बतलाऊँ हिल उठे, इन्द्रासन भी आज।।
* * *
(30 ) एकलव्य को कर दिया, बेबस-ओ-बेकार।
मिला नहीं गुरु द्रोण को, फिर भी चैन-क़रार।।
* * *
(31) शर-शय्या पर लेट कर, भीष्म हुए गम्भीर।
मुझको पानी दे वही, जिसने मारे तीर।।
* * *
(32) गुरु-द्रोण हर्षित हुए, मन में बहुत अपार।
एकलव्य को कर दिया, जब बेबस-लाचार।।
* * *
(33) सज-धज कर सब आ गए, हुआ न लेकिन खेल।
शर्त राधिका की रही, लाओ नौ मन तेल।।
* * *
(34) गोकुल-मथुरा को मिला, यह कैसा संत्रास।
ना कान्हा की बाँसुरी, ना राधा का रास।।
* * *
(35) जग-भर में मशहूर है, जब यह प्रेम-प्रसंग।
विवाह रचाया क्यों नहीं, कान्हा राधा संग।।
* * *
(36) साँस-साँस जलधार है, मन गंगा का घाट।
कब आओगे रामजी, देखें तेरी बाट।।
* * *
(37) आँख-आँख में है जलन, साँस-साँस में टीस।
दर्शन दे शीतल करो, सबके मन जगदीश।।
* * *
(38) तूने क्या बृज को तजा, उड़ती है अब धूल।
पानी खारा हो गया, पेड़ों पर हैं शूल।।
* * *
(39) छोड़ बृज जब तुम गए, छूटा मन का रास।
मन साँसों की बाँसुरी, कान्हा पड़ी उदास।।
* * *
(40) हे भगवन् मत देर कर, अब ले-ले अवतार।
पाप और पापी बढे, कर इनका संहार।।
* * *
(41) जनता ही जब ना रही, फिर पूजेगा कौन।
जनता का दुःख देखकर, और न रह तू मौन।।
* * *
(42) आसन पर यूँ बैठकर, फेंक न तू मुस्कान।
जनता अब दम तोड़ती, कर ले इसका ध्यान।।
* * *
(43) आदि-अन्त की बात कर, बन बैठा विद्वान्।
बीच राह के दर्द की, ले-ले सुधि सुजान।।
* * *
(44) इससे ज़्यादा ज़ेहन पर, क्या होगा अज्ञान।
औरों को मूरख कहे, ख़ुद को ही विद्वान्।।
* * *
(45) दूर-दूर बस दूर तक, देखा यही कमाल।
हुआ किरण को देखकर, अँधियारा बेहाल।।
* * *
(46) जो कहना है कह अभी, साफ़ भूमिका बाँध।
अगर-मगर की तू यहाँ, खिचड़ी-सी मत राँध।।
* * *
(47) लेकिन, किन्तु-परन्तु की, अब क्यों लेता आड़।
हरा-भरा ये खेत ख़ुद, तूने लिया उजाड़।।
* * *
(48) अगर-मगर को राखिये, सदा आपने संग।
ये दो ऐसे तीर हैं, फ़तह करावें जंग।।
* * *
(49) लालच में जब मन हुआ, भावनाओं से हीन।
मानव बनकर रह गया, तबसे एक मशीन।।
* * *
(50) जबसे मन करने लगा, रिश्तों की तौहीन।
पाँव तले जो थी कभी, खिसकी वही ज़मीन।।
* * *
(51) अधरों से जब भी कभी, फेंकी है मुस्कान।
दिल में झंकृत हो उठी, वीणा की-सी तान।।
* * *
(52) प्रेम-रोग जिसको लगे, हालत यही बनाय।
छुई-मुई के पेड़-सा, मन शरमाता जाय।।
* * *
(53) 'माँझी' मन के बाग़ में, तरह-तरह के फूल।
इनके रंगों में रखो, ज़िन्दा मगर उसूल।।
* * *
(54) बहुत इमारत भव्य थी, आज बनी अवशेष।
मतलब बदले प्रेम के, रही वासना शेष।।
* * *
(55) विश्वासों से है बटी, प्रेम-मिलन की डोर।
गाँठ तनिक भी ना पड़े, सावधान चितचोर।।
* * *
(56) एक समय के बाद ही, हुआ हमें यह बोध।
सबसे दूरी कर गया, सिर्फ़ ज़रा-सा क्रोध।।
* * *
(57) हमको यह चेता गए, करके ज्ञानी शोध।
मन को कलुषित ही करे, छल, छद्म और क्रोध।।
* * *
(58 ) ज़िन्दे को पूछा नहीं, मरा तो बुत बनवाय।
जग में लोगों ने दिया, अपना फ़र्ज़ निभाय।।
* * *
(59 ) ज़िन्दा 'माँझी' घूमता, नंगा बदन उठाय।
इससे तो मरना भला, चादर तो मिल जाय।।
* * *
(60 ) मन से लड़कर जीत ली, जिसने अपनी जंग।
वो दुनिया को दे गया, एक अनोखा रंग।।
* * *
(61) फिर भी लेते नाम सब, उसका इज़्ज़त संग।
रहता है सागर सदा, बेशक नंग-धडंग।।
* * *
(62 ) राजनीति दिखला रही, अजब-अनूठे रंग।
उनकी पूजा हो रही, जो चेहरे बदरंग।।
* * *
(63 ) है ये मेरे देश में, कैसी रेलमपेल।
ख़ारिज करके रख दिए, गांधी और पटेल।।
* * *
(64 ) दर्शक बनकर देखते, हम सत्ता का खेल।
बिन पटरी के भागती, सभी दलों की रेल।।
* * *
(65) लोकतन्त्र के देश में, इसका है अवसाद।
धुन्ध चढ़ा सूरज बना, मेरा गांधीवाद।।
* * *
(66) अगर होंठ ख़ामोश हैं, ना तू खीज अज़ीज़।
सब-कुछ ही तो कह रही, मेरी फटी क़मीज़।।
* * *
(67) जिनके पाँवों में कभी, पड़ी नहीं ज़ंजीर।
वो क्या जाने किस तरह, बिलखै है तक़दीर।।
* * *
(68) 'माँझी' देखो वक़्त को, देखो इसके ठाठ।
मुझको मेरे दर्द का, पढ़ा रहा है पाठ।।
* * *
(69) बेबस बनकर वे रहें, और रहें बेहाल।
जिनको भी उलझाय है, कंक्रीट का जाल।।
* * *
(70) सपने सब खण्डित हुए, टूट गए विश्वास।
किससे 'माँझी' अब करें, तुम्ही बताओ आस।।
* * *
(71) बदलें जीवन ये सदा, देखो सपने रोज़।
बस इनके साकार की, राह निकालो खोज।।
* * *
(72) किस ढब मैं विश्वास के, अपने जोड़ूँ तार।
डोली मेरी जब लुटी, ग़ायब मिले कहार।।
* * *
(73) 'माँझी' अपने देश को, क्यों ना कहें महान्।
तू हिन्दू, वो मुसलमाँ, सबके अलग विधान।।
* * *
(74) कल सत्ता-सुख भोगकर, हुए जो मालामाल।
क्यों उनकी बँटने लगी, अब जूतों में दाल।।
* * *
(75) आग लगी है रोम में, जलते हैं इन्सान।
नीरो फिर भी दे रहा, निज बन्सी पर तान।।
* * *
(76) 'माँझी' इस संसार में, सबके उलटे पैर।
किसको अपना मैं कहूँ, किसको मानूँ ग़ैर।।
* * *
(77) कब से पैनी कर रहा, हथियारों की धार।
मित्र-मिलन को जाएगा, होकर वो तैयार।।
* * *
(78) करें उजाला क़ैद ये, फैलाते हैं रात।
लगा रहे ढोंगी सभी, कैसी-कैसी घात।।
* * *
(79) मतलब उनका है है पड़ा, तब कहते हैं 'बाप'।
अगर निकल मतलब गया, तब बोलेंगे--'आप?'
* * *
(80) दुनिया के ये आचरण, या अपने ऐ'माल।
एक तराजू पास है, क्या-क्या तोलूँ माल।।
* * *
(81) अपनी तो हम ले रहे, अगर-मगर में ओट।
औरों के व्यवहार में, ढूँढ़ रहे हैं खोट।।
* * *
(82) शीशा लेकर हाथ में, पहले ख़ुद को जान।
तब संभव हो पाएगी, औरों से पहचान।।
* * *
(83) बदल रहे तेवर सभी, हवा हुई मुस्कान।
शीशा लेकर मत चलो, 'माँझी' पकड़ो कान।।
* * *
(84) बुझता-बुझता कह गया, दीपक भाव-विभोर।
खाता उतना ताव वो, जो जितना कमज़ोर।।
* * *
(85) मन में ले विश्वास सब, देखें तेरी ओर।
भगवन् इस विश्वास की, टूट न जाए डोर।।
* * *
(86) आँख मूँदकर चल सकें, जिस पर सभी फ़क़ीर।
'माँझी' तू ही खींच दे, ऐसी कोई लकीर।।
* * *
(87) वाणी-वाणी में फ़रक़, 'माँझी' दे समझाय।
वाणी राज दिलाय दे, वाणी दे मरवाय।।
(88) दौड़भाग में चढ़ गई, सबको बहुत थकान।
ऐसी करनी कर चलूँ, फैले जो मुस्कान।।
(89) जितनी जल्दी हो सके, निज आपे को मार।
खुट-खुट करके इस तरह, तू मत बनें कुम्हार।।
(90) बिना उड़े क्यों मान ली, आसमान से हार।
इतना पहले था नहीं, तू बेबस-लाचार।।
(91) ठोस धरातल पर कभी, कर भी लो व्यापार।
सपनों के सौदगरो, सिर्फ़ मिलेगी हार।।
(92) है ये शहरी सभ्यता, इससे मोह बिसार।
जितने ऊँचे हैं महल, उतने तुच्छ विचार।।
(93) कैसे दुनिया से मिटे, बतला हा-हाकार।
सच्चाई की देह पर, होते हैं नित वार।।
(94) नज़र लगी किसकी इसे, टूटा है हर अंग।
सच्चाई का रूप अब, हुआ बहुत बदरंग।।
(95) एक तरफ़ सच्चाइयाँ, एक तरफ़ हैं ख़्वाब।
इन दोनों के बीच में, जीवन बना अजाब।।
(96) कडुवी-खोटी बात पर, डाल वक़्त की धूल।
बदबू को ग़ायब करो, और सजाओ फूल।।
(97) कभी प्रलय का रूप ये, कभी बनें हमवार।
बिजली, बादल, बूँद के, अर्थ बहुत हैं यार।।
(98) ये गुलशन था प्रेम था, उग आये हैं झाड़।
'माँझी' मौसम ने किया, कैसा ये खिलवाड़।।
(99) बलात्कार-हत्या सहित, चोरी-अत्याचार।
इन सबकी अख़बार में, रहती है भरमार।।
(100) ये तो तेरी सोच है, ख़ुशहाली के हेतु।
बना रहा है रोज़ ही, सम्बन्धों के सेतु।।
(101) कभी उतारी आरती, दिया बहुत सम्मान।
भ्रमित हो उसने किया, आज बहुत अपमान।।
(102) पति-पत्नी के बीच में, जब आये ससुराल।
समझो मेरी बात ये, बिगड़ें सब सुर-ताल।।
(103) फिर भी पूरी ना हुई, उनके मन की ।
राजनीति के नाम पर, करते रोज़ ।।
(104) मकड़ी फँस मरती वहीं, जो उस निर्मित जाल ।
'माँझी' ऐसा ही यहाँ, है ये मायाजाल ।।
(105) अँधियारा ही फैलता, 'माँझी' चारों ओर।
कब होगी जानूँ नहीं, मेरे मन की भोर।।
(106) मोबाइल ने कर दिया, फीका सारा प्यार।
अब स्वजन भेजें नहीं, चिट्ठी-पत्री-तार।।
(107) दान-दहेज अपार की, ना लाई सौगात।
सजी सेज पर इसलिए, दुल्हन चीखी रात।।
(108) चाल-चलन बदले सभी, बदले अब विश्वास।
परम्परा को दे दिया, नूतन ने बनवास।।
(109) घर के झगड़े-शोर जब, आये मुझे न रास।
दो दिन घर टिककर रहा, सालों मैं बनवास।।
(110) पीठ दिखा सब रह गये, कौन रहा था पास।
कुछ यादें ही शेष थीं, जब काटा बनवास।।
(111) जितनी भी गहराएगी, घोर अँधेरी रात।
उतनी ही उजली यहाँ, होगी नवल प्रभात।।
(112) बस मुझको मालूम है, यही पते की बात।
नई सुबह की कोख हैं, जितनी भी हैं रात।।
(113) वो ही मेरी प्रात: थी, वो ही मेरी शाम।
जीवन मैंने जी लिया, जितना भी गुमनाम।।
(114) जोश-जोश में कर नहीं, उलटे-सीधे काम।
दिन ढलते ही रात का, आता है पैग़ाम।।
(115) भूख-भूख में फ़र्क़ है, कई तरह की भूख।
इक उदार, इक ताज की, एक देह की भूख।।
(116) मजबूरी ने कर दिया, उसको कितना ढीठ।
बोझा फिर भी ढो रहा, झुकी हुई है पीठ।।
(117)
(118)
(119)
(120)
(121)
मैं ख़ुद बनकर रह गया, इस जीवन पर भार।।
* * *
(23) तू ब्रह्मा, मैं ब्रह्म अंश, 'माँझी' समझूँ सार।
तू भी खेवनहार है, मैं भी खेवनहार।।
* * *
(24) मर्यादा के वास्ते, जीवन करूँ निसार।
खाता हूँ मैं ये शपथ, लेकर हाथ अँगार।।
* * *
(25) सागर तट पर सब खड़े, 'माँझी' लेकर नाव।
कोई जल को देखता, कोई जल के घाव।।
* * *
(26) जो दुनिया की नाव को, करा सके है पार।
'माँझी' उसको ही कहूँ, मैं सच्चा अवतार।।
* * *
(27) अगल-बग़ल सब झाँकते, आती सबको लाज।
शायद सबके सामने, इक दर्पण है आज।।
* * *
(28) कर्म अगर करता रहा, तो है ये विश्वास।
झुक जाएगा एक दिन, क़दमों में आकाश।।
* * *
(29) नैतिकता को थाम कर, चल ले अगर समाज।
सच बतलाऊँ हिल उठे, इन्द्रासन भी आज।।
* * *
(30 ) एकलव्य को कर दिया, बेबस-ओ-बेकार।
मिला नहीं गुरु द्रोण को, फिर भी चैन-क़रार।।
* * *
(31) शर-शय्या पर लेट कर, भीष्म हुए गम्भीर।
मुझको पानी दे वही, जिसने मारे तीर।।
* * *
(32) गुरु-द्रोण हर्षित हुए, मन में बहुत अपार।
एकलव्य को कर दिया, जब बेबस-लाचार।।
* * *
(33) सज-धज कर सब आ गए, हुआ न लेकिन खेल।
शर्त राधिका की रही, लाओ नौ मन तेल।।
* * *
(34) गोकुल-मथुरा को मिला, यह कैसा संत्रास।
ना कान्हा की बाँसुरी, ना राधा का रास।।
* * *
(35) जग-भर में मशहूर है, जब यह प्रेम-प्रसंग।
विवाह रचाया क्यों नहीं, कान्हा राधा संग।।
* * *
(36) साँस-साँस जलधार है, मन गंगा का घाट।
कब आओगे रामजी, देखें तेरी बाट।।
* * *
(37) आँख-आँख में है जलन, साँस-साँस में टीस।
दर्शन दे शीतल करो, सबके मन जगदीश।।
* * *
(38) तूने क्या बृज को तजा, उड़ती है अब धूल।
पानी खारा हो गया, पेड़ों पर हैं शूल।।
* * *
(39) छोड़ बृज जब तुम गए, छूटा मन का रास।
मन साँसों की बाँसुरी, कान्हा पड़ी उदास।।
* * *
(40) हे भगवन् मत देर कर, अब ले-ले अवतार।
पाप और पापी बढे, कर इनका संहार।।
* * *
(41) जनता ही जब ना रही, फिर पूजेगा कौन।
जनता का दुःख देखकर, और न रह तू मौन।।
* * *
(42) आसन पर यूँ बैठकर, फेंक न तू मुस्कान।
जनता अब दम तोड़ती, कर ले इसका ध्यान।।
* * *
(43) आदि-अन्त की बात कर, बन बैठा विद्वान्।
बीच राह के दर्द की, ले-ले सुधि सुजान।।
* * *
(44) इससे ज़्यादा ज़ेहन पर, क्या होगा अज्ञान।
औरों को मूरख कहे, ख़ुद को ही विद्वान्।।
* * *
(45) दूर-दूर बस दूर तक, देखा यही कमाल।
हुआ किरण को देखकर, अँधियारा बेहाल।।
* * *
(46) जो कहना है कह अभी, साफ़ भूमिका बाँध।
अगर-मगर की तू यहाँ, खिचड़ी-सी मत राँध।।
* * *
(47) लेकिन, किन्तु-परन्तु की, अब क्यों लेता आड़।
हरा-भरा ये खेत ख़ुद, तूने लिया उजाड़।।
* * *
(48) अगर-मगर को राखिये, सदा आपने संग।
ये दो ऐसे तीर हैं, फ़तह करावें जंग।।
* * *
(49) लालच में जब मन हुआ, भावनाओं से हीन।
मानव बनकर रह गया, तबसे एक मशीन।।
* * *
(50) जबसे मन करने लगा, रिश्तों की तौहीन।
पाँव तले जो थी कभी, खिसकी वही ज़मीन।।
* * *
(51) अधरों से जब भी कभी, फेंकी है मुस्कान।
दिल में झंकृत हो उठी, वीणा की-सी तान।।
* * *
(52) प्रेम-रोग जिसको लगे, हालत यही बनाय।
छुई-मुई के पेड़-सा, मन शरमाता जाय।।
* * *
(53) 'माँझी' मन के बाग़ में, तरह-तरह के फूल।
इनके रंगों में रखो, ज़िन्दा मगर उसूल।।
* * *
(54) बहुत इमारत भव्य थी, आज बनी अवशेष।
मतलब बदले प्रेम के, रही वासना शेष।।
* * *
(55) विश्वासों से है बटी, प्रेम-मिलन की डोर।
गाँठ तनिक भी ना पड़े, सावधान चितचोर।।
* * *
(56) एक समय के बाद ही, हुआ हमें यह बोध।
सबसे दूरी कर गया, सिर्फ़ ज़रा-सा क्रोध।।
* * *
(57) हमको यह चेता गए, करके ज्ञानी शोध।
मन को कलुषित ही करे, छल, छद्म और क्रोध।।
* * *
(58 ) ज़िन्दे को पूछा नहीं, मरा तो बुत बनवाय।
जग में लोगों ने दिया, अपना फ़र्ज़ निभाय।।
* * *
(59 ) ज़िन्दा 'माँझी' घूमता, नंगा बदन उठाय।
इससे तो मरना भला, चादर तो मिल जाय।।
* * *
(60 ) मन से लड़कर जीत ली, जिसने अपनी जंग।
वो दुनिया को दे गया, एक अनोखा रंग।।
* * *
(61) फिर भी लेते नाम सब, उसका इज़्ज़त संग।
रहता है सागर सदा, बेशक नंग-धडंग।।
* * *
(62 ) राजनीति दिखला रही, अजब-अनूठे रंग।
उनकी पूजा हो रही, जो चेहरे बदरंग।।
* * *
(63 ) है ये मेरे देश में, कैसी रेलमपेल।
ख़ारिज करके रख दिए, गांधी और पटेल।।
* * *
(64 ) दर्शक बनकर देखते, हम सत्ता का खेल।
बिन पटरी के भागती, सभी दलों की रेल।।
* * *
(65) लोकतन्त्र के देश में, इसका है अवसाद।
धुन्ध चढ़ा सूरज बना, मेरा गांधीवाद।।
* * *
(66) अगर होंठ ख़ामोश हैं, ना तू खीज अज़ीज़।
सब-कुछ ही तो कह रही, मेरी फटी क़मीज़।।
* * *
(67) जिनके पाँवों में कभी, पड़ी नहीं ज़ंजीर।
वो क्या जाने किस तरह, बिलखै है तक़दीर।।
* * *
(68) 'माँझी' देखो वक़्त को, देखो इसके ठाठ।
मुझको मेरे दर्द का, पढ़ा रहा है पाठ।।
* * *
(69) बेबस बनकर वे रहें, और रहें बेहाल।
जिनको भी उलझाय है, कंक्रीट का जाल।।
* * *
(70) सपने सब खण्डित हुए, टूट गए विश्वास।
किससे 'माँझी' अब करें, तुम्ही बताओ आस।।
* * *
(71) बदलें जीवन ये सदा, देखो सपने रोज़।
बस इनके साकार की, राह निकालो खोज।।
* * *
(72) किस ढब मैं विश्वास के, अपने जोड़ूँ तार।
डोली मेरी जब लुटी, ग़ायब मिले कहार।।
* * *
(73) 'माँझी' अपने देश को, क्यों ना कहें महान्।
तू हिन्दू, वो मुसलमाँ, सबके अलग विधान।।
* * *
(74) कल सत्ता-सुख भोगकर, हुए जो मालामाल।
क्यों उनकी बँटने लगी, अब जूतों में दाल।।
* * *
(75) आग लगी है रोम में, जलते हैं इन्सान।
नीरो फिर भी दे रहा, निज बन्सी पर तान।।
* * *
(76) 'माँझी' इस संसार में, सबके उलटे पैर।
किसको अपना मैं कहूँ, किसको मानूँ ग़ैर।।
* * *
(77) कब से पैनी कर रहा, हथियारों की धार।
मित्र-मिलन को जाएगा, होकर वो तैयार।।
* * *
(78) करें उजाला क़ैद ये, फैलाते हैं रात।
लगा रहे ढोंगी सभी, कैसी-कैसी घात।।
* * *
(79) मतलब उनका है है पड़ा, तब कहते हैं 'बाप'।
अगर निकल मतलब गया, तब बोलेंगे--'आप?'
* * *
(80) दुनिया के ये आचरण, या अपने ऐ'माल।
एक तराजू पास है, क्या-क्या तोलूँ माल।।
* * *
(81) अपनी तो हम ले रहे, अगर-मगर में ओट।
औरों के व्यवहार में, ढूँढ़ रहे हैं खोट।।
* * *
(82) शीशा लेकर हाथ में, पहले ख़ुद को जान।
तब संभव हो पाएगी, औरों से पहचान।।
* * *
(83) बदल रहे तेवर सभी, हवा हुई मुस्कान।
शीशा लेकर मत चलो, 'माँझी' पकड़ो कान।।
* * *
(84) बुझता-बुझता कह गया, दीपक भाव-विभोर।
खाता उतना ताव वो, जो जितना कमज़ोर।।
* * *
(85) मन में ले विश्वास सब, देखें तेरी ओर।
भगवन् इस विश्वास की, टूट न जाए डोर।।
* * *
(86) आँख मूँदकर चल सकें, जिस पर सभी फ़क़ीर।
'माँझी' तू ही खींच दे, ऐसी कोई लकीर।।
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(87) वाणी-वाणी में फ़रक़, 'माँझी' दे समझाय।
वाणी राज दिलाय दे, वाणी दे मरवाय।।
(88) दौड़भाग में चढ़ गई, सबको बहुत थकान।
ऐसी करनी कर चलूँ, फैले जो मुस्कान।।
(89) जितनी जल्दी हो सके, निज आपे को मार।
खुट-खुट करके इस तरह, तू मत बनें कुम्हार।।
(90) बिना उड़े क्यों मान ली, आसमान से हार।
इतना पहले था नहीं, तू बेबस-लाचार।।
(91) ठोस धरातल पर कभी, कर भी लो व्यापार।
सपनों के सौदगरो, सिर्फ़ मिलेगी हार।।
(92) है ये शहरी सभ्यता, इससे मोह बिसार।
जितने ऊँचे हैं महल, उतने तुच्छ विचार।।
(93) कैसे दुनिया से मिटे, बतला हा-हाकार।
सच्चाई की देह पर, होते हैं नित वार।।
(94) नज़र लगी किसकी इसे, टूटा है हर अंग।
सच्चाई का रूप अब, हुआ बहुत बदरंग।।
(95) एक तरफ़ सच्चाइयाँ, एक तरफ़ हैं ख़्वाब।
इन दोनों के बीच में, जीवन बना अजाब।।
(96) कडुवी-खोटी बात पर, डाल वक़्त की धूल।
बदबू को ग़ायब करो, और सजाओ फूल।।
(97) कभी प्रलय का रूप ये, कभी बनें हमवार।
बिजली, बादल, बूँद के, अर्थ बहुत हैं यार।।
(98) ये गुलशन था प्रेम था, उग आये हैं झाड़।
'माँझी' मौसम ने किया, कैसा ये खिलवाड़।।
(99) बलात्कार-हत्या सहित, चोरी-अत्याचार।
इन सबकी अख़बार में, रहती है भरमार।।
(100) ये तो तेरी सोच है, ख़ुशहाली के हेतु।
बना रहा है रोज़ ही, सम्बन्धों के सेतु।।
(101) कभी उतारी आरती, दिया बहुत सम्मान।
भ्रमित हो उसने किया, आज बहुत अपमान।।
(102) पति-पत्नी के बीच में, जब आये ससुराल।
समझो मेरी बात ये, बिगड़ें सब सुर-ताल।।
(103) फिर भी पूरी ना हुई, उनके मन की ।
राजनीति के नाम पर, करते रोज़ ।।
(104) मकड़ी फँस मरती वहीं, जो उस निर्मित जाल ।
'माँझी' ऐसा ही यहाँ, है ये मायाजाल ।।
(105) अँधियारा ही फैलता, 'माँझी' चारों ओर।
कब होगी जानूँ नहीं, मेरे मन की भोर।।
(106) मोबाइल ने कर दिया, फीका सारा प्यार।
अब स्वजन भेजें नहीं, चिट्ठी-पत्री-तार।।
(107) दान-दहेज अपार की, ना लाई सौगात।
सजी सेज पर इसलिए, दुल्हन चीखी रात।।
(108) चाल-चलन बदले सभी, बदले अब विश्वास।
परम्परा को दे दिया, नूतन ने बनवास।।
(109) घर के झगड़े-शोर जब, आये मुझे न रास।
दो दिन घर टिककर रहा, सालों मैं बनवास।।
(110) पीठ दिखा सब रह गये, कौन रहा था पास।
कुछ यादें ही शेष थीं, जब काटा बनवास।।
(111) जितनी भी गहराएगी, घोर अँधेरी रात।
उतनी ही उजली यहाँ, होगी नवल प्रभात।।
(112) बस मुझको मालूम है, यही पते की बात।
नई सुबह की कोख हैं, जितनी भी हैं रात।।
(113) वो ही मेरी प्रात: थी, वो ही मेरी शाम।
जीवन मैंने जी लिया, जितना भी गुमनाम।।
(114) जोश-जोश में कर नहीं, उलटे-सीधे काम।
दिन ढलते ही रात का, आता है पैग़ाम।।
(115) भूख-भूख में फ़र्क़ है, कई तरह की भूख।
इक उदार, इक ताज की, एक देह की भूख।।
(116) मजबूरी ने कर दिया, उसको कितना ढीठ।
बोझा फिर भी ढो रहा, झुकी हुई है पीठ।।
(117)
(118)
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